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5 साल की वो बच्ची जिसकी माँ ज़िन्दगी की तकलीफों से हार कर अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी। मीलों दूर बैठा पिता जिसके पास अपनी बच्ची को कॉपी, पेन दिलाने तक के पैसे नहीं थे। वो लड़की जिसके साथ ईश्वर ने भी इन्साफ नहीं किया। जिसे जन्म लेते ही विकलांगता की पहचान दे दी। विरासत में कुछ मिला था तो वो थी गरीबी। ज़िन्दगी की आखिर कौन-सी तकलीफ होगी जो उम्मुल खेर (Ummul Kher) ने न सही हो। वो उम्मुल जो बचपन में अपनी पढ़ाई के लिए हर बार ये मिन्नत करती थी कि बस एक साल और फिर अगले साल मेरा स्कूल से नाम कटवा देना।

जिंदगी में इतने उतार-चढ़ावों के बाद कई लोगों की हिम्मत टूट जाती है। वो इतने बिखर जाते हैं कि निराश होकर जिंदगी की राह में पीछे रह जाते हैं। लेकिन इन तमाम चुनौतियों के बावजूद उम्मुल ने संघर्ष किया। अपनी मंजिल पाने तक डटी रहीं। जीवन की अनगिनत बाधाओं को उम्मुल ने पीछे छोड़ दिया। कभी हार नहीं मानी। अपने पहले ही प्रयास में UPSC को पास कर अपने सपने को साकार किया। उम्मुल खेर (Ummul Kher) आज एक जाना पहचाना नाम है।

पहले प्रयास में ही पायी सफलता

आज के समय में जिनके पास सुविधाएँ हैं, फिर भी आसान रास्ते ढूंढते उन सभी युवाओं के बीच उम्मुल खैर एक ऐसा नाम है, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि जिंदगी में कुछ भी हो सकता है। अगर आपके अंदर लगन है, कुछ करने की चाहत है और जुनून है तो दुनिया में सब कुछ संभव है। UPSC 2016 में अपने पहले ही प्रयास में 420वां रैंक हासिल कर सफलता का शानदार परचम लहराने वाली उम्मुल खैर, जो जन्म से ही विकलांग थीं लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि उम्मुल खेर (Ummul Kher) ने कभी भी अपनी इस कमजोरी को कमजोरी नहीं माना बल्कि इसे अपनी ताकत बनाकर अपनी सफलता की सीढ़ियां चढ़ी।

प्रारंभिक जीवन

राजस्थान के पाली मारवाड़ के एक छोटे से गाँव सोजत की रहने वाली उम्मुल जन्म लेते ही अजैले बोन डिसऑर्डर नाम की बीमारी से ग्रसित थीं। यह एक दुर्लभ बीमारी है। जो आमतौर पर कमजोर हड्डियों से सम्बंधित होती है। हर तरफ से मुश्किलों ने तो घेर रखा ही था, लेकिन इस बीमारी ने उनके जीवन को बेहद कठिन बना दिया था। उस पर गरीबी ने बची कुची कसर पूरी कर दी थी। जब हड्डियां कमज़ोर होती हैं तो गिरने पर फ्रैक्चर होने की ज्यादा संभावना रहती है। जिसके कारण 28 साल की उम्मुल को लगभग 15 से भी ज्यादा बार फ्रैक्चर का सामना करना पड़ा।

बचपन में ही माँ से दूर होना पड़ा

उम्मुल की माँ एक पढ़े लिखे कश्मीरी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उम्मुल के जन्म के दस महीने बाद ही उनके पिता दिल्ली चले गये थे। जिसके बाद उनकी माँ ने जिम्मेदारियों का बीड़ा अपने सिर उठाया। पास के ही स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन समाज की कुरीतियों और जंजाल से वो इतनी त्रस्त हो गयी कि उनकी मानसिक हालत ख़राब हो गयी। जिसके बाद उम्मुल को उनके पिता और नई माँ के पास दिल्ली भेज दिया गया। एक 5 साल की बच्ची जिसके सिर से माँ का हाथ उठ गया। उसके लिए इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है।

दिल्ली में सड़क किनारे फुटपाथ पर उम्मुल के पिता छोटा मोटा सामान बेचा करते थे। निजामुद्दीन स्थित झुग्गियां में उनका पूरा परिवार रहता था। जो उन दिनों गरीबी और संघर्षों से जूझ रहा था। 2001 में वो छत भी सर से चली गयी। जब झुग्गियां टूट गयी और सभी लोगों को त्रिलोकपुरी इलाके की ओर आसरा लेने जाना पड़ा।

संघर्ष की राह अकेले चलना सीखा

इतना कुछ झेलने के बाद उम्मुल को बचपन में ही इस बात का एहसास तो हो ही चुका था कि अगर बेहतर ज़िन्दगी चाहिए तो पढ़ना होगा। मेहनत करनी होगी। वही एकमात्र उपाय है और कुछ बनने के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण है। लेकिन उनकी नई माँ नहीं चाहती थी कि वो आगे की पढ़ाई करें बल्कि वो यह चाहती थी कि उम्मुल को सिलाई-कढ़ाई सीखना चाहिए। जिससे वो घर पर रहकर कुछ काम कर सकें। घर की स्थिति को देखते हुए उम्मुल ने स्वयं 7वीं कक्षा से ही छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था।

उम्मुल हर बार स्कूल खुलने पर अपने घर में बस एक ही मिन्नत करती थी कि बस इस बार और स्कूल जाने दो अगली बार मेरा नाम कटवा देना। लेकिन उम्मुल का यह संघर्ष इतना आसान नहीं था आठवीं के बाद नौवीं कक्षा में प्रवेश के लिए घर में कोई भी नहीं माना और उम्मुल को राजस्थान भेजने की पूरी तैयारी कर दी गयी। और उसके बाद उम्मुल ने जो कदम उठाया वो बड़े – बड़े नहीं कर पाते। उम्मुल ने अंततः विवश होकर घर छोड़ दिया और पास में ही एक किराये का मकान लेकर ट्यूशन पढ़ाकर अपना और अपनी पढ़ाई का खर्चा उठाने का निश्चय किया। मात्र नौवीं क्लास की एक छोटी बच्ची के लिए यह फैसला बहुत बड़ा था। उम्मुल ने इस चुनौती को भी पूरे ह्रदय से स्वीकार कर सामना किया।

स्कालरशिप से की पढ़ाई

इतने तनाव के बावजूद भी उम्मुल अपनी आठवीं की परीक्षा में अव्वल नंबर से पास हुई थीं। जिसके लिए उन्हें स्कॉलरशिप मिली और स्कॉलरशिप की बदौलत उन्हें एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। दसवीं में 91% और 12वीं में 90% अंक लाकर उम्मुल को दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिल गया। उम्मुल ने गार्गी कॉलेज में साइकोलॉजी से अपना ग्रेजुएशन किया। साथ ही ट्यूशन पढ़ाना जारी रखा।

उम्मुल खेर (Ummul Kher) की जिंदगी को एक नया मोड़ JNU आकर मिला। जहाँ उन्होंने अपना मास्टर्स किया। इसी के साथ उनके जीवन में बदलाव आये। मास्टर करने के बाद उन्होंने वहीं से एमफिल भी किया। लेकिन अपनी रेगुलर पढ़ाई और घंटों ट्यूशन पढ़ाने के दौरान उम्मुल को अपने बचपन के सपने को पूरा करने के लिए समय नहीं मिल पा रहा था, जो उन्हें चाहिए था। इस समय का भी उम्मुल ने बखूबी उपयोग किया। उन्होंने दिव्यांग जनों के अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका नेतृत्व किया और कई देशों की यात्राएं भी की।

और फिर मिल गई मंज़िल

उम्मुल ने नेट क्लियर कर JRF पाया जिसके बाद उनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी सुदृढ हुई और तब उन्होंने निश्चय किया कि अब मुझे अपने सपने को पूरा करने के सफर की शुरुआत करनी है और साथ ही यह भी कहीं न कहीं मन था कि पहले ही प्रयास में अपने लक्ष्य को पाना है। उम्मुल खेर (Ummul Kher) बताती हैं कि तैयारी का समय मेरे लिए संघर्ष के उन सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा सुविधाजनक था।

बस वो इस बात को अपनी मानती हैं कि इस दौरान उन्होंने खुद को कुछ ज्यादा ही आत्म अनुशासित बना लिया था जिसके चलते वो बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट गयी थीं जिसके कारण उन्हें अपनी गलतियों को सुधारने के कम अवसर मिल पाए। ज़िन्दगी के तमाम मोड़ों से गुजर कर आखिर 2017 में उम्मुल ने परीक्षा दी और अपने पहले ही प्रयास में UPSC का कठिन इम्तिहान पास कर 420वां रैंक हासिल किया।

जिसका साथ उसके परिवार तक ने छोड़ दिया था आज वो उन्हें माफ़ कर चुकी हैं। उम्मुल खैर, जिसने गरीबी, विकलांगता हर एक मुश्किल को मात देकर समाज के समक्ष एक बेमिसाल उदाहरण पेश किया। उम्मुल खैर के जज़्बे को उनकी हिम्मत को हम सलाम करते हैं।

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