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दोस्तों आज हम जानेंगे राजस्थान के एक ऐसे लड़के की कहानी जिसने अपनी मेहनत के बल पर जो लक्ष्य ठाना वो प्राप्त किया। राजस्थान की मिट्टी के इस लाल ने अपने कैरियर की शुरुआत ग्रुप-डी की नौकरी करते हुए की, जहां वो पटरियों की मरम्मत किया करते थे। ये कहानी है कदम दर कदम चलते हुए ग्रुप-डी के गैंगमैन से एक आईपीएस ऑफिसर बनने तक का सफर तय करनेवाले प्रहलाद मीणा (Prahlad Meena) की।

प्रहलाद सहाय मीणा की रेलवे गैंगमैन से आईपीएस बनने तक की कहानी काफी प्रेरणादायक है। एक-एक कदम चलकर जिस तरह धैर्य रखते हुए प्रहलाद मीणा (Prahlad Meena) ने अपनी मंजिल को प्राप्त किया, वो यकीनन आपको बहुत कुछ सिखाने वाला है।

जहाँ की पटरी की मरम्मत, वहीँ बने IPS अधिकारी

उन्हें यूपीएससी में 3 बार और आरपीएससी में 1 बार असफलता मिली लेकिन उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी और हर बार पिछली बारी से ज़्यादा मेहनत की और एक समय वो आया जब उन्होंने सफलता को छू ही लिया। प्रहलाद मीणा की सफलता की दास्तां कितनी मुश्किल भरी होगी ये इस बात से समझा जा सकता है वो आपने गांव के पहले आईपीएस हैं उनको राह दिखाने वाला कोई नहीं था उन्होंने अपनी राह खुद खोजी है। मेहनत एक इंसान को कहा से कहा ले जाती है, ये इस बात से साबित होता है कि जिस ओड़िसा में प्रहलाद पटरियों की मरम्मत किया करते थे। उसी ओड़िसा में कुछ साल बाद आईपीएस अधिकारी हैं।

किसान पिता की संतान

प्रहलाद सहाय मीणा ओड़िसा कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। इनका चयन जनवरी 2017 में भारतीय पुलिस सेवा में 951वीं रैंक पर हुआ था। 27 फरवरी 1988 को जन्में प्रहलाद मीणा, मूलरूप से राजस्थान के दौसा जिले की रामगढ़ पचवारा तहसील के निजामपुर गाँव से ताल्लुक रखते हैं। इनके पिता शिवराम मीणा एक किसान हैं और माता प्रेमी देवी गृहणी हैं। प्रहलाद सहाय मीणा वर्तमान में ओड़िसा के मलकानगिरी में बतौर SDO कार्यरत हैं और नेशनल पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण पर हैं।

प्रारम्भिक शिक्षा

प्रहलाद सहाय मीणा का बचपन गांव में ही बीता। उनके गाँव मे शिक्षा के प्रति जागरूकता का काफी अभाव था बावजूद इसके प्रहलाद हमेशा से अव्वल दर्जे के विद्यार्थी रहे। जब 10वीं का रिजल्ट आया तो प्रहलाद प्रथम स्थान पर आए इसके बाद वो साइंस लेकर आगे इंजीनियर बनना चाहते थे लेकिन उनके गाँव में साइंस का कोई स्कूल नहीं था और परिवार इतना सक्षम भी नहीं था कि उनको बाहर भेजकर पढ़ा सके और उनका खर्चा उठा सके। यही सब सोचकर प्रहलाद ने अपना सपना खत्म कर लिया और आर्ट्स लेकर 11वीं में पढ़ाई शुरू कर दी।

इसके बाद 12वीं में भी वो स्कूल में प्रथम स्थान पर रहे लेकिन अब उनकी प्राथमिकता बदल चुकी थी। वो आगे पढ़ाई करने के लिए पहले एक नौकरी चाहते थे, जिससे वो अपना खर्चा स्वयं उठा सकें क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे जयपुर में उनको कमरा दिलवाकर पढ़ाई करवा सकें।

आर्थिक तंगी बनी बाधा

चूँकि प्रहलाद एक निम्न वर्गीय परिवार की पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते थे ऐसे में उनके लिए एक अच्छी नौकरी खोजना बहुत जरूरी था। जिस वक्त वो 12वीं कक्षा में थे उस समय उनके गांव से एक लड़के का चयन रेलवे ग्रुप डी गैंगमैन में हो गया था तो क्योंकि ज्यादा जागरूकता थी नहीं तो इन्होंने भी गैंगमैन बनने का लक्ष्य बना लिया और तैयारी करने लगे। लगभग दो साल बाद जब वो बीए द्वितीय वर्ष में थे, तब 2008 में उनका भुवनेश्वर बोर्ड से गैंगमैन के पद पर चयन हो गया। लेकिन इसके बाद भी इन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उसी साल इनका चयन एसबीआई में एलडीसी की पोस्ट पर हो गया। एलडीसी की नौकरी के साथ भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और 2010 में एसबीआई में ही उनका चयन परीवीक्षाधीन अधिकारी के पद पर हो गया।

इसके बाद भी प्रहलाद के जुनून में कोई कमी नहीं आई और वो पहले से भी ज़्यादा मेहनत करने लगे। प्रहलाद मीणा (Prahlad Meena) ने कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित होने वाली संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा दी, जिसमें उन्हें रेलवे मंत्रालय में सहायक अनुभाग अधिकारी के पद पर पदस्थापन मिला। चूंकि अब अच्छी पोस्ट पर रहकर दिल्ली से ही वो परिवार की सारी जिम्मेदारी निभाने लगे थे तो नौकरी के साथ ही उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी शुरू कर दी, जिसके बारे में उनके किसी दोस्त ने बताया था।

सिविल सेवा का जूनून

प्रहलाद मीणा (Prahlad Meena) एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उन्होंने ठान लिया था। एक बार सिविल सेवा परीक्षा पास करनी ही है और दुनिया को दिखाना है कि मैं भी यह कर सकता हूं। जिससे कि कई छात्र है मेरे जैसे जो ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं, उनमें प्रतिभा है, लेकिन एक जो आत्मविश्वास होता है वह नहीं आ पाता और यह तभी आता है, जब उनके जैसा कोई सफल होता है। तभी उनको लगता है कि यह अगर हमारे गांव से, हमारे साथ पढ़ा हुआ, हमारे जितना ही बुद्धिमान था, अगर यह इस परीक्षा को पास करता है तो शायद हम भी कर सकते हैं। यही आत्मविश्वास सिविल सेवा परीक्षा में बहुत जरूरी रहता है।

प्रहलाद मीणा आगे बताते हैं कि सिविल सेवा परीक्षा में पास करने के पीछे उनका एक यह लालच यह भी था कि वो अपने पचवारा क्षेत्र से पहले सिविल सर्वेंट बनना चाहते थे। 2015 की सिविल सेवा परीक्षा में प्रारम्भिक परीक्षा ही वो पास नहीं कर पाए। आई.ए.एस. की परीक्षा में लगातार असफलताओं के बाद भी कभी उनके मन में ये नहीं आया कि वो ये नहीं कर पाएंगे बल्कि वो हर बार पिछली बार से ज़्यादा अंक लाकर अपनी मंजिल के नजदीक पहुँचने का प्रयास कर रहे थे। प्रयास करते-करते आखिरकार उनकी मेहनत सफल हुई।

उतार-चढ़ाव से कभी नहीं घबराये

इस तरह उनकी सफलता में काफी उतार चढ़ाव आते रहे लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वर्ष 2015 में जब वो सिविल सेवा परीक्षा को पास नहीं कर पाए तो ऐसे में बिना हताश हुए हिंदी साहित्य से MA करने में लगा गए और उस के साथ ही नेट जेआरएफ की तैयारी में लग गए। इसके बाद इनका नेट जेआरएफ क्लियर हो गया। इसी साल राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा कॉलेज लेक्टरर परीक्षा में प्रहलाद शामिल हुए लेकिन 1 नंबर से इंटरव्यू के लिए चयन नहीं हो पाया। जिसके बाद उन्होंने 2016 में पुनः पूरी मेहनत से सिविल सेवा परीक्षा दी जिसमें ना सिर्फ उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा पास की बल्कि उनका फाइनल सेलेक्शन भी हुआ, जिसमें 951वीं रैंक लाकर उत्तीर्ण हुए।

प्रहलाद सहाय मीणा सिविल सेवा परीक्षा में तीन बार फेल भी हुए, मगर उन्होंने हौसला बनाए रखा। ​मेहनत करनी नहीं छोड़ी। नतीजा आज आप सभी के सामने है। गाँव के सरकारी स्कूल से आईपीएस ऑफिसर बनने तक का सफर केवल कड़ी मेहनत से ही संभव हुआ है।

प्रतिभा और दयालु मन का संगम

राजस्थान के दौसा जिले के एक छोटे से गाँव में पढ़ने वाले प्रहलाद सहाय मीना ने दिखा दिया कि कम साधन होने के बावजूद, अगर आपके अंदर कुछ कर गुज़रने का जज़्बा है तो आप किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हो। असफलताएं आती रहेंगी लेकिन आपको अपने लक्ष्य से निशाना नहीं हटाना है। जिस तरह से प्रहलाद सहाय मीना ने लगातार असफलताओं के बाद भी हार नहीं मानी और हर बार पिछली बार से ज़्यादा मेहनत करके अपने लक्ष्य के करीब पहुँचते हुए आखिरकार अपनी मंजिल पाई, वो काफी प्रेरणादायक है।

अगर प्रहलाद सहाय मीणा 11वीं में साइंस ना ले पाने की बात ही लेकर बैठे रहते तो कुछ भी नहीं कर पाते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि जो परिस्थितियों से उनको मिला उसको ही लेकर आगे बढ़े और अपनी सफलता का परचम पूरे देश में लहराया।

इतनी मेहनत के बाद अपनी मंजिल पर पहुँचने वाला इंसान किसी जोहरी के तराशे हुए हीरे के समान हो जाता है। वो इंसान सबसे ज़्यादा खास हो जाता है। उदहारण के तौर पर प्रहलाद मीणा (Prahlad Meena) को ही लिया जा सकता है, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान कई मजदूरों को उनके घर पहुँचाने से लेकर गरीबों के खाने-पीने की व्यवस्था भी की। इससे जाहिर होता है कि कड़ी मेहनत ना केवल आपको व्यक्तिगत रूप से बेहतर बनाती है बल्कि सामाजिक रूप से एक बेहतर इंसान भी बनाती है।

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