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सफलता महत्वपूर्ण क्यों है? अगर सफल होना है तो उसके लिए क्या आवश्यक है? अपने उद्देश्य को, अपने लक्ष्य को पाने में आप कैसे सफल होंगे?
इन्हीं सवालों से जुड़ी आज आपको एक कहानी सुनाते हैं।

यह कहानी है एक छोटे-से बच्चे गोलू और उसके पापा की। गोलू के पापा रामलाल, जिन्हें सब प्यार से रामू काका कहते थे, पेशे से एक डाकिया थे और गोलू उनका लाडला इकलौता बेटा। हिमाचल के एक छोटे से गांव में वो लोग पहाड़ियों में रहते थे। शहर से दूर शांत यह जगह जितना सुकून देती थी, कभी-कभी उतनी ही तकलीफ भी, क्योंकि यहां ना तो साधन थे और ना ही 4G नेटवर्क।

माना कि बहुत कुछ नहीं था उनके पास, पर जो भी था उतना काफी था। कभी-कभी रामू काका दुखी जरूर हो जाते थे कि वह गोलू को दुनिया की सुख सुविधाएं नहीं दे पाते पर फिर भी गोलू और रामू काका दोनों की जिंदगी काफी आराम से और राजी खुशी कट रही थी।

गोलू को किताबें पढ़ने का बड़ा शौक था। उसे जब जहां जो किताब मिल जाए बैठकर पढ़ने लगता था। पापा के साथ अगर वह डाक खाने जाता था तो वहां भी उसे जो किताब मिल जाती थी उसे बैठकर पढ़ने लगता था।

एक दिन गोलू अपने पापा के साथ वापस घर आ रहा था। रोज पहाड़ियों में साइकिल चलाने का काका अपना सालों के तजुर्बा था। ऊंचे-नीचे रास्तों पर रामू काका की टर्न-टर्न करती साइकिल पर बैठकर गोलू को बड़ा मजा आता था। पर उस दिन अचानक से पता नहीं क्या हुआ कि रामू काका साइकिल लेकर गिर पड़े। गोलू भी गिर पड़ा, गोलू को चोट लगी और वह रोने लगा। अपनी चोट देखकर रो रहे गोलू ने ध्यान नहीं दिया कि रामू काका उठे ही नहीं। फिर गोलू उठा और पापा के पास गया उसने कहा कि पापा देखो मुझे कितनी जोर से लगी है। आप पता नहीं कैसे कहाँ देख कर चला रहे थे। एक दो बार पापा के सामने शिकायत की लेकिन पापा कुछ बोले नहीं। यह देखकर गोलू घबरा गया और ज्यादा जोर से रोने लगा क्योंकि शाम का सुनसान समय था, पहाड़ियों के रास्तों में गोलू को कोई भी नही मिला, गोलू ने खूब चिल्लाया इधर-उधर आवाज भी लगाई, पर ना कोई गाड़ी मिली और ना कोई आदमी। रोते-रोते थक कर गोलू वही सो गया। अगले दिन सुबह सुबह जब वहां से लोग गुजरे तो उन्होंने रामू काका और गोलू को उठाया। गोलू तो उठ गया पर रामू काका नहीं रहे।

लोगों ने गोलू को बहला-फुसलाकर शांत कराया और घर ले गए। गोलू एक दम शांत हो गया, गोलू ने पूरी रात अकेले गुजारी थी, वो खूब रोया था, उसे सब कुछ याद था, उसने किसी से कुछ नहीं कहा, पर वह अंदर ही अंदर कुछ सोच रहा था।

कुछ दिनों के बाद गोलू स्कूल जाने लगा। स्कूल में टीचर ने भी गोलू को खूब समझाया और कहा कि अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। आखिर रामू काका भी यही चाहते थे कि गोलू 1 दिन बहुत बड़ा आदमी बने। उसने पढ़ाई शुरू कर दी पर अब गोलू कहानियों की नहीं अपने सिलेबस की किताबें पढ़ने लगा। उसने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और देखते ही देखते एक दिन बहुत बड़ा इंजीनियर बना। एक सिविल इंजीनियर बनकर उसने अपने उसी गांव में पहाड़ियों में जाकर कुछ ऐसी व्यवस्था की कि इमरजेंसी में लोगों को जल्द से जल्द मदद मिल सके। उसे उन वीरान पहाड़ियों में अकेले भटकना ना पड़े।

जिस दिन गोलू ने यह काम किया और वहां के लोगों ने उसकी बहुत तारीफें की, तब उसने एक बात कही कि काश यही काम किसी ने पहले किया होता तो आज मेरे बाबा मेरे साथ होते। उसने बताया कि उसने बचपन में किसी को कहते हुए सुना था कि काका को सिर्फ चक्कर आये थे, पर गिरने के कारण उन्हें थोड़ी चोट लग गयी थी, जो फर्स्ट एड से ही आसानी ठीक हो सकती थी, पर इतनी देर हो जाने के कारण वो नहीं रहे क्योंकि उस वक्त मैं छोटा बच्चा था और मैं उनके लिए कुछ भी नहीं कर पाया, पर आज मैंने यह काम इसलिए किया है कि मेरे बाबा की जगह कोई और ना ले। ऐसा दोबारा किसी के साथ ना हो।

ऐसी कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी पर इसे सुनाने के पीछे जो मकसद था वो यह था कि किसी भी काम को करने के लिए, कुछ भी पढ़ने के लिए, कुछ भी करने के लिए, और जो कर रहे हैं उसमें सफल होने के लिए कुछ बोहोत जरूरी है, तो वो है “वजह”!

आप जो भी कर रहे हो, आपका जहाँ भी मन लगता हो, उसमें कामयाब होने के लिए उस कामयाबी की कीमत जानना बहुत ज़रूरी है। पर कीमत जानने के लिए हर किसी का गोलू बनना भी ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी है तो वो है लगन, मेहनत, खुद पर विश्वास और हमेशा याद रखना अपने उद्देश्य में कामयाब वही होते हैं, जो खुद को ऊपर उठाने के लिए मेहनत करते हैं, किसी को नीचा दिखाने वाले कभी सफल नहीं होते हैं।

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